पवन द्वारा जो अपरदनात्मक कलाकृति नहीं है वह हैं –
सही उत्तर: स्तूप
व्याख्या (Explanation)
छत्रक शिला: मरुस्थली भागों में यदि कठोर चट्टानों के रूप में ऊपरी आवरण के नीचे कोमल चट्टाने लम्बवत रूप में मिलती हैं तो उस पर पवन के अपघर्र्षण के प्रभाव से विभिन्न स्थलरूपों का निर्माण होता है। पवन द्वारा चट्टान के निचले भाग में अत्यधिक अपघर्षण द्वारा उसका आधार कटने लगता है, जबकि उसका ऊपरी भाग अप्रभावित रहता है। साथ ही यदि पवन कई दिशाओं में चलती है तो चट्टान का निचला भाग चारों तरफ से अत्यधिक कट जाने के कारण पतला हो जाता है, जबकि ऊपरी भाग अप्रभावित रहता है। इससे एक छतरीनुमा स्थलरूप का निर्माण होता है, जिसे छत्रक शिला कहते हैं। छत्रक शिला को सहारा के रेगिस्तान में गारा कहते हैं। भूस्तंभ: शुष्क प्रदेश में जहाँ पर असंगठित तथा कोमल चट्टानों के ऊपर कठोर तथा प्रतिरोधी चट्टानों का आवरण होता है, वहाँ इस आवरण के कारण नीचे की कोमल चट्टानों का अपरदन नहीं हो पाता। लेकिन नजदीकी चट्टानों के अपरदन के कारण कठोर चट्टानों के आवरण वाला भाग एक स्तंभ के रूप में सतह पर दिखाई देता है जिसे भू-स्तम्भ कहते हैं। ज्यूजेन: मरुस्थली भाग में यदि कठोर तथा कोमल शैलों की परतें ऊपर-नीचे एक-दूसरे के समानान्तर होती है तो अपक्षय तथा वायु द्वारा अपरदन के कारण विभिन्न स्थलरूपों का निर्माण होता है। इन स्थलरूपों के ऊपरी भाग पर कठोर चट्टानों का आवरण होता है एवं इनका ऊपरी भाग समतल होता है। इन्हें ज्यूजेन कहते हैं।
स्रोत: Raj Jail Warder (20-10-18) Shift 1