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राजस्थान की हस्तकला / हस्तशिल्प PYQ in Hindi - पेज 6

इस पेज पर Rajasthan GK के राजस्थान की हस्तकला / हस्तशिल्प से संबंधित पिछले वर्षों में पूछे गए महत्वपूर्ण वस्तुनिष्ठ प्रश्न (MCQ) उत्तर और व्याख्या सहित दिए गए हैं। कुल 311 प्रश्नों में से यह पेज 6 है।

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निम्नलिखित में से कौन-सी छपाई शैली बाड़मेर से संबंधित है और इसमें लाल व नीले रंग का प्रयोग दोनों तरफ छपाई के साथ किया जाता है?

Aसांगानेरी प्रिंट
Bअजरक प्रिंट
Cबगरू प्रिंट
Dजाजम प्रिंट

सही उत्तर: अजरक प्रिंट

व्याख्या (Explanation)

बाड़मेर के अजरक प्रिंट के वस्त्र प्रसिद्ध है। इस प्रिंट में लाल और नीले रंग का प्रयोग किया जाता है तथा दोनों तरफ छपाई होती है। खत्री जाति इस कार्य को करने के लिए प्रसिद्ध है।

52

दाबू प्रिंट के संदर्भ में निम्नलिखित में से कौन-सा कथन गलत है -

Aआकोला (चित्तौड़गढ़) दाबू प्रिंट के लिए प्रसिद्ध है और यहाँ की प्राकृतिक परिस्थितियाँ इसके लिए अनुकूल हैं।
Bदाबू प्रिंट में रंग न चढ़ाने वाले स्थान को “लई” या “लुगदी” से दबाया जाता है, जिसे “दाबू” कहते हैं।
Cसांगानेर और बगरू में गेहूँ के बींधण का दाबू प्रयोग होता है, जबकि सवाई माधोपुर में मोम का दाबू प्रसिद्ध है।
Dदाबू प्रिंट में लकड़ी का छापा “बटकाड़े” कहलाता है, जिसे छीपा जाति के लोग बनाते हैं।

सही उत्तर: दाबू प्रिंट में लकड़ी का छापा “बटकाड़े” कहलाता है, जिसे छीपा जाति के लोग बनाते हैं।

व्याख्या (Explanation)

चित्तौड़गढ़ जिले का आकोला गांव दाबू प्रिन्ट के लिए प्रसिद्ध है। यहाँ की प्राकृतिक परिस्थितियाँ इस रंगाई-छपाई के लिए अनुकूल है। पानी, मिट्टी और वनस्पति जैसे आवश्यकताएँ स्थानीय रूप से उपलब्ध है आकोला के दाबू प्रिन्ट के बेडशीट, कपड़ा, चून्दड़ी व फेंटिया देश-विदेश में प्रसिद्ध है। इस प्रकार की रंगाई-छपाई मे जिस स्थान पर रंग नहीं चढ़ाना हो, उसे लई या लुगदी से दबा देते है। यही लुगदी या लई जैसा पदार्थ ‘दाबू’ कहलाता है। हाथ की छपाई में काम आने वाला लकड़ी का छापा बटकाड़े कहलाता है जिसका निर्माण ख़रादिये द्वार किया जाता है। कपड़ों पर परंपरागत तरीके से हाथ से छपाई को ब्लॉक प्रिंटिंग कहते है। इस प्रिंटिग के लिए बाडमेर, बालोतरा, बगरू, सांगानेर, आकोला आदि स्थानों के छीपा जाति के लोग प्रसिद्ध है।

53

निम्नलिखित में से कौन-सा कथन बंधेज रंगाई के संदर्भ में सही नहीं है -

Aजोधपुर और जयपुर का बंधेज प्रसिद्ध है, और राज्य में बंधेज की सबसे बड़ी मंडी जोधपुर में स्थित है।
Bबंधेज का सर्वाधिक काम सुजानगढ़ (चूरू) में होता है, और इसके कारीगर तैय्यब खान को पद्मश्री से सम्मानित किया गया है।
Cमहिलाएँ बंधेज की साड़ी और ओढ़नी पहनती हैं, जबकि पुरुष इसके साफे नहीं बाँधते।
Dबंधेज को “Tie & Die” के नाम से भी जाना जाता है।

सही उत्तर: महिलाएँ बंधेज की साड़ी और ओढ़नी पहनती हैं, जबकि पुरुष इसके साफे नहीं बाँधते।

व्याख्या (Explanation)

जोधपुर तथा जयपुर का बंधेज प्रसिद्ध है। महिलाएं इस रंगाई की साड़ी तथा ओढ़नी पहनती है। जबकि पुरुषों द्वारा इस रंगाई के साफे बांधे जाते है। राज्य में बन्धेज की सबसे बड़ी मंडी जोधपुर में स्थित है तथा बन्धेज का सर्वाधिक काम सुजानगढ़ (चूरू) में होता है। बन्धेज कार्य के लिए जोधपुर के कारीगर तैय्यब खान को पद्मश्री से सम्मानित किया जा चुका है।

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टेराकोटा और मूर्तिकला के संदर्भ में निम्नलिखित में से कौन-सा विकल्प गलत है -

Aमोलेला गाँव टेराकोटा कला का प्रमुख केंद्र है और यहाँ मिट्टी में गधे की लीद मिलाई जाती है।
Bअलवर की कागजी टेराकोटा मिट्टी की बारीक और परतदार कलात्मक वस्तुओं के लिए जानी जाती है।
Cराजस्थान में मूर्तिकला का व्यवस्थित विकास गुप्त काल से शुरू हुआ था।
Dबीकानेर में हेरम्ब गणपति (शेर पर सवार) की मूर्ति स्थापित है।

सही उत्तर: राजस्थान में मूर्तिकला का व्यवस्थित विकास गुप्त काल से शुरू हुआ था।

व्याख्या (Explanation)

पक्की मिट्टी का उपयोग करके मूर्तियाँ, बर्तन, खिलौने आदि बनाने की कला को टेराकोटा के नाम से जाना जाता है। नाथद्वारा के पास स्थित मोलेला गांव इस कला का प्रमुख केन्द्र बना हुआ है। इसी प्रकार जालौर के हरजी गांव के कुम्हार मामाजी के घोड़े बनाते है। मोलेला तथा हरजी दोनों ही स्थानों मे कुम्हार मिट्टी में गधे की लीद मिलाकर मूर्तियाँ बनाते है व उन्हें ताप पर पकाते है। गधे की लीद मिलाने से कलाकृति में दरारे नहीं पड़ती है। मिट्टी के खिलौने, गुलदस्ते, गमले तथा पशु-पक्षियों की कलाकृतियों के काम के लिए नागौर जिले का बनूरावतां गावं प्रसिद्ध है। कागजी टेराकोटा – अलवर में मिट्टी की बिल्कुल बारीक व परतदार कलात्मक वस्तुएं बनाई जाती हैं। इसे ‘कागजी टेराकोटा’ कहते हैं। राजस्थान में व्यवस्थित ढंग से मूर्तिकला का विकास मौर्यकाल से आरम्भ हुआ। डुंगरपुर संग्रहालय में गुप्तोतर कालीन शैव मूर्तियों का बाहुल्य है। हेरम्ब गणपति (शेरपर सवार) – बीकानेर में स्थापित है।

55

ब्ल्यू पॉटरी के संदर्भ में निम्नलिखित में से कौन-सा कथन सही है -

Aइस कला की शुरुआत जयपुर में महाराजा मानसिंह प्रथम ने की और इसके विकास का श्रेय सवाई रामसिंह को है।
Bब्ल्यू पॉटरी का जन्म भारत में हुआ और यह जयपुर से ईरान तक फैली।
Cकोटा की सुनहरी ब्लैक पॉटरी में लाख के रंगों का प्रयोग होता है।
Dकृपाल सिंह शेखावत को इस कला के लिए पद्म भूषण से सम्मानित किया गया था।

सही उत्तर: इस कला की शुरुआत जयपुर में महाराजा मानसिंह प्रथम ने की और इसके विकास का श्रेय सवाई रामसिंह को है।

व्याख्या (Explanation)

जयपुर में ब्ल्यू पॉटरी निर्माण की शुरूआत का श्रेय महाराजा रामसिंह को है। उन्होने चूडामन और कालू कुम्हार को पॉटरी का काम सीखने दिल्ली भेजा और प्रशिक्षित होने पर उन्होने जयपुर मे इस हुनर की शरूआत की। ब्ल्यू पॉटरी कला का जन्म ईरान में हुआ था। राजस्थान में ‘ब्ल्यू पॉटरी’ के लिये जयपुर सर्वाधिक प्रसिद्ध है। जयपुर में ब्ल्यू पौटरी प्रारम्भ करने का श्रेय मानसिंह (प्रथम) को है, जबकि सवाई रामसिंह के समय इस कला का विकास हुआ। अलवर की डबल कट वर्क की पॉटरी को कागजी कहा जाता है। कोटा सुनहरी ब्लेक पॉटरी फूलदानों, मटकों और प्लेटों के लिए प्रसिद्ध है। बीकानेर की पॉटरी में लाख के रंगों का प्रयोग होता है। जयपुर के कृपाल सिंह शेखावत इसके सिद्धहस्त कलाकार थे। कला में उनके योगदान हेतु 1974 में उन्हें पद्म श्री तथा 1980 में कलाविद सम्मान से सम्मानित किया गया था।

56

लाख की हस्तकला के बारे में निम्नलिखित में से कौन-सा विकल्प सही है -

Aलाख की चूड़ियाँ केवल जयपुर में बनती हैं और इन्हें “मोकड़ी” कहा जाता है।
Bमहाराजा मानसिंह प्रथम के समय लाख कला को संरक्षण मिला और यह जोधपुर में सर्वाधिक विकसित हुई।
Cसवाई माधोपुर और इंद्रगढ़ में लकड़ी के खिलौनों पर खराद से लाख का पक्का काम किया जाता है।
Dलाख का काम केवल चूड़ियों तक सीमित है और इसमें काँच का प्रयोग नहीं होता।

सही उत्तर: सवाई माधोपुर और इंद्रगढ़ में लकड़ी के खिलौनों पर खराद से लाख का पक्का काम किया जाता है।

व्याख्या (Explanation)

जयपुर एवं जोधपुर में लाख एवं काँच से विविध कलात्मक सामान जैसे खिलौने, मूर्तियाँ, गुलदस्ते, हार, अंगूठियां, कर्णफूल, झुमके तथा चाबियों के गुच्छे आदि का निर्माण किया जाता है। जयपुर के महाराजा रामसिंह के समय लाख कला को भरपूर संरक्षण मिला। लाख की चूड़ियों का काम मुख्य रूप से जयपुर, करौली, हिंडोन में होता है । लाख की चूड़िया मोकड़ी कहलाती है। राजस्थान में लाख पर हस्तशिल्प का कार्य जयपुर, उदयपुर, जोधपुर, अजमेर एवं भरतपुर में विशेष रूप से होता है। सवाई माधोपुर ,खेडला, लक्ष्मणगढ़ ,इंद्रगढ़ (कोटा) में लकड़ी के खिलौने व अन्य वस्तुओं पर खराद से लाख का पक्का काम किया जाता है। लाख से चूड़ियाँ, चूड़े, पशु-पक्षी, पेन्सिलें, पैन, काँच जड़ें लाख के खिलौने, बिछिया आदि तैयार किए जाते है।

57

हाथी दांत की चूड़ियों और कलात्मक वस्तुओं के निर्माण के संदर्भ में निम्नलिखित में से कौन-सा कथन सही नहीं है -

Aजोधपुर में हाथी दांत की चूड़ियाँ बनाई जाती हैं और यह राजस्थानी महिलाओं में सौभाग्य का प्रतीक मानी जाती हैं।
Bजयपुर के आमेर महल में चंदन के किवाड़ों पर 17वीं शताब्दी की हाथी दांत की पच्चीकारी का काम देखा जा सकता है।
Cउदयपुर और पाली में हाथी दांत की चूड़ियाँ नहीं बनतीं, केवल खिलौने और मूर्तियाँ बनाई जाती हैं।
Dराजपूत समाज में विवाह के अवसर पर हाथी दांत का चूड़ा पहनने की प्रथा है।

सही उत्तर: उदयपुर और पाली में हाथी दांत की चूड़ियाँ नहीं बनतीं, केवल खिलौने और मूर्तियाँ बनाई जाती हैं।

व्याख्या (Explanation)

राजस्थानी महिलाओं में सौभाग्य की प्रतीक हाथी दांत की चूड़ियां व अन्य सामान जोधपुर में बनाया जाता है। इसके अतिरिक्त उदयपुर व पाली में भी हाथी दांत की चुड़ियां बनती है। राजस्थान के राजपूत समाज में विवाह के अवसर पर हाथी दांत का चूड़ा पहनने की प्रथा है। हाथी दांत के खिलौने, मूर्तिया एवं अनेक कलात्मक वस्तुएं राज्य में जयुपर, उदयपुर, भरतपुर, मेड़ाता और पाली में बनाई जाती है।

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निम्नलिखित में से कौन-सी कला फौलाद या लोहे पर सोने की सूक्ष्म कसीदाकारी से संबंधित है और इसका उपयोग हथियारों को अलंकृत करने के लिए किया जाता है -

Aतारकशी
Bकोफ्तगिरी
Cबादला
Dतहनिशां

सही उत्तर: कोफ्तगिरी

व्याख्या (Explanation)

फौलाद अथवा लोहे पर सोने की सूक्ष्म कसीदाकारी कोफ्त गिरी कहलाती है। यह हथियारों को अलंकृत करने की कला है, जो भारत में मुगलों के प्रभाव के कारण उभरी थी। इसमें जडाव (इनले) और ओवरले दोनों प्रकार की कला का कार्य होता है। इसके कलाकार को कोफ़्तगर कहा जाता है। कोफ्तगिरी जयपुर एवं अलवर में बहुतायत से होती है।

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थेवा कला के संदर्भ में निम्नलिखित में से कौन-सा कथन सही नहीं है -

Aयह कला काँच पर सोने की मीनाकारी के लिए जानी जाती है।
Bयह कला विश्व में केवल प्रतापगढ़ जिले तक सीमित है।
Cइसके कारीगरों को “पन्नीगर” कहा जाता है।
Dइस कला को जयपुर के “राज सोनी परिवार” ने विकसित किया।

सही उत्तर: इस कला को जयपुर के “राज सोनी परिवार” ने विकसित किया।

व्याख्या (Explanation)

काँच पर सोने की मीनाकारी को थेवा कला कहा जाता है। इसके लिए रंगीन बेल्जियम काँच का प्रयोग किया जाता है। अलग-अलग रंगों के काँच पर सोने की चित्रकारी इस कला का आकर्षण है। थेवा कला विश्व मे केवल प्रतापगढ़ जिले तक ही सीमित है। थेवा कला के कारीगर पन्नीगर कहलाते है। तथा इस कार्य को पन्नीगरी कहते है। इस कला को जानने वाले शिल्पी “राज सोनी परिवार” राजस्थान के प्रतापगढ़ में ही रहते हैं। इस हस्तशिल्प कला को, ‘ज्योग्राफ़िकल आइडेंटिफ़िकेशन टैग’ (GI Tag) मिल भी मिल चुका है।

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‘मांडना’ एक पारंपरिक लोक कला है: निम्नलिखित विकल्पों में से सर्वाधिक उपयुक्त उत्तर चुनें:

📋 पूछा गया: Animal Attendant 2023 Exam (December 1 Shift II)
Aगोआ की
Bमहाराष्ट्र की
Cराजस्थान की
Dकेरल की

सही उत्तर: राजस्थान की

व्याख्या (Explanation)

मांडना राजस्थान की एक पारंपरिक लोक कला है, जिसमें दीवारों और फर्श पर रंगीन चित्र बनाए जाते हैं, विशेष रूप से त्योहारों के दौरान।

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स्रोत: Animal Attendant 2023 Exam (December 1 Shift II)

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