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राजस्थानी मुहावरे,कहावतें और लोकोक्तियाँ

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राजस्थान की संस्कृति ग्राम्य प्रधान संस्कृति है। प्रदेश में लोक अंचल में रहने वाले मनुष्यों का पहनावा, खान-पान आचार-विचार एवं दिनचर्या उनके काम धंधे के आधार पर निश्चित होती रही हैं। राजस्थान की कहावतें कई मायनों में सदैव सत्य ही सिद्ध होती रही वहीं इन्हीं कहावतों में कई विशेष जानकारी भी मिलती हैं। प्रदेश की लोक संस्कृति में लोक कहावतें भी अपना महत्वपूर्ण योगदान रखती है जो गागर में सागर भरने का कार्य करती है समय के साथ कई कहावतें केवल किताबों में ही रह गयी वहीं अनेक कहावतें आज भी समाज में आम है।

  1. अंटी में आणौ : किसी के फंदे या जाल में फँसना।
  2. अंधा की माखी राम उड़ावै : बेसहारे व्यक्ति का साथ भगवान देता है।
  3. अंधाधुंध की साहबी, घटाटोप को राज : विवेकहीन शासकों के शासन में राज्य में अंधकार छा जाता है
  4. अकल बिना ऊंट उभाणा फिरैं : मूर्ख व्यक्ति साधन होते हुए भी उनका उपयोग नहीँ कर पाते।
  5. अकल भांग खाणी : मूर्खता का काम करना।
  6. अक्कल उधारी कोनी मिलै : अकल उधार में प्राप्त नहीं होती।
  7. अक्कल कोई कै बाप की कोनी : अकल पर किसी का सर्वाधिकार नहीं है
  8. अगस्त ऊगा, मेह पूगा : अगस्त माह शुरू होते ही वर्षा पहुँच जाती है
  9. अग्रे अग्रे ब्राह्मणा, नदी नाला बरजन्ते : बुद्धिमान व्यक्ति सलाह देने में आगे होते हैं, लेकिन शारीरिक जोखिमों से बचते हैं
  10. अठे किसा काचर खाच है : यहाँ दाल गलने वाली नहीं है।
  11. अठे गुड़ गीलो कोनी : हमें मूर्ख मत समझना।
  12. अणदोखी नै दोख, बीनै गति न मोख : जो निर्दोष पर दोष लगाता है, उसे न गति (स्वर्ग) मिलता है, न मोक्ष।
  13. अणमांग्या मोती मिलै, मांगी मिलै न भीख : बिना मांगे कीमती चीज मिल जाती है पर मांगने पर भीख भी नहीं मिलती है
  14. अणी चूकी धार मारी : सावधानी हटते ही दुर्घटना हो जाती है।
  15. अत पितवालो आदमी, सोए निद्रा घोर। अण पढ़िया आतम कही, मेघ आवै अति घोर॥ : अधिक पित्त प्रकृति का व्यक्ति यदि दिन मेँ भी अधिक सोए तो यह भारी वर्षा का सूचक है।
  16. अदपढ़ी विद्या धुवै चिन्त्या धुवे सरीर : अधूरे ज्ञान से चिंता बढती है और शरीर कमजोर होता है
  17. अनहोणी होणी नहीं, होणी होय सो होय : जो नहीं होना है वह होगा नहीं और होने को टाल नहीं सकते है
  18. अभागियो टाबर त्यूंहार नै रूसै : सुअवसर से भी लाभ न उठा पाना।
  19. अम्बर कै थेगळी कोनी लागै : आकाश में पैच नहीं लगाया जा सकता
  20. अम्बर को तारो हाथ सै कोनी टूटे : आकाश का तारा हाथ से नहीँ टूटता।
  21. अम्बर पटकी धरती झेली : जिसके आगे पीछे कोई न हो।
  22. अम्बर राच्यो, मेह माच्यो : आसमान का लाल होना वर्षा का सूचक है
  23. अम्मर पीळो में सीळो : आसमान का पीला होना वर्षा का सूचक है
  24. अरजन जसा ही फरजन : सब एक जैसे हैं
  25. अरड़ावतां ऊँट लदै : दीन पुकार पर भी ध्यान न देना
  26. असी रातां का असां ही तड़का : बुरे कामों का नतीजा भी बुरा ही होता है।
  27. असो भगवान्यू भोलो कोनी जको भूखो भैँसा मेँ जाय : कोई मूर्ख होगा जो प्रतिफल की इच्छा के बगैर कार्य करे।
  28. अेक नै अेक इग्यारै होवणौ : एकता में शक्ति होती है।
  29. आ छाय तो ढोलियां जोगी ही थी : बेकार वस्तु के नुकसान का दुःख न होना।
  30. आ रै मेरा सम्पटपाट, मैँ तनै चाटूँ तू मनै चाट : दो मूर्ख लोगोँ की बातचीत निरर्थक होती है।
  31. आँ तिलां मैँ तेल कोनी : क्षमता का अभाव
  32. आँख गई संसार गयो, कान गयो हंकार गयो : आँख फूटने पर संसार दिखाई नहीँ देता वैसे ही बहरा होने पर अहंकार समाप्त हो जाता है।
  33. आँख चूकणी : लापरवाह होना या न देखना।
  34. आँख मीँच्या अँधेरो होय : ध्यान न देने पर अहसास का न होना।
  35. आँख रौ काजळ : बहुत प्यारा।
  36. आँख/आँखियां तरसणी : देखने के लिए आतुर होना।
  37. आँख/आँखियां फाणी : आश्चर्यचकित होना।
  38. आँखन, कान, मोती, करम, ढोल, बोल अर नार। अ तो फूट्या ना भला, ढाल, ताल, तलवार॥ : ये सभी चीजेँ न ही टूटे-फूटे तो ही अच्छा है।
  39. आँख्याँ देखी परसराम, कदे न झूठी होय : आँखों से प्रत्यक्ष देखी हुई बात कभी झूठी नहीं हो सकती।
  40. आंधा मेँ काणोँ राव : मूर्खोँ मेँ कम गुणी व्यक्ति का भी आदर होता है।
  41. आंधा रा तंदूरा रामदेवजी बजावै : बेसहारा व्यक्ति की ईश्वर मदद करता है।
  42. आक में ईख, फोग में जीरो : बुरे कुल में सज्जन व्यक्ति का जन्म
  43. आग में घी पूळौ नांखणौ : लड़ाई-झगड़े को तीव्र करना, किसी के क्रोध को और भड़काना।
  44. आगे थारो पीछे म्हारो : जैसा आप करेँगे वैसा ही हम
  45. आज मरयो दिन दूसरो : जो हुआ सो हुआ।
  46. आज हमां और काल थमां : जो आज हम भुगत रहे हैँ, कल तुम भुगतोगे
  47. आटै दाळ रौ भाव ठा पड़णौ : होश ठिकाने आना।
  48. आडा आया माँ का जाया : कठिनाई मेँ सगे सम्बन्धी (भाई) सहायता करते हैँ
  49. आडू चाल्या हाट, न ताखड़ी न बाट : मूर्ख का कार्य अव्यवस्थित होना
  50. आदै थाणी न्याय होय : बुरे/बेईमान को फल मिलता है।
  51. आधी नै छोड़ आखी भावै तो आधी ई जावै : अत्यधिक लोभ नुकसानदायक होता है।
  52. आप कमाडा कामडा, दई न दीजे दोस : व्यक्ति के किये गए कर्मोँ के लिए ईश्वर को दोष नहीँ देना चाहिए
  53. आप गुरुजी कातरा मारै, चेला नै परमोद सिखावै : निठल्ले गुरुजी का शिष्योँ को उपदेश देना।
  54. आप डुबंतो पांडियो ले डूब्यो जजमान : मुसीबत का मारा मुखिया सबको मुसीबत में डाल देता है।
  55. आप मरयां बिना सुरग कठै : काम स्वयं ही करना पड़ता है।
  56. आपरी मां ने कुण डाकण केवै : स्वयं में या अपने लोगों में कौन दोष निकालता है।
  57. आम के अणी नहीं, वैश्या के धणी नहीं : जिसका कोई पता ठिकाना नहीं हो।
  58. आम खाणा क पेड़ गिणना : मतलब से मतलब रखना
  59. आला बंचै न आपसै, सूखा बंचै न कोई के बाप सैं : हस्तलेख खराब होना।
  60. आषाढ़ की पूनम, निरमल उगै चंद। कोई सिँध कोई मालवे जायां कट सी फंद॥ : आषाढ़ की पूर्णिमा को चाँद के साथ बादल न होने पर अकाल की शंका व्यक्त की जाती है।
  61. इब ताणी तो बेटी बाप कै ही है : अभी कुछ नहीँ बिगड़ा
  62. इसी भैण का इसा ही बीरा : बुरे लोगों के मित्र भी बुरे होते हैं।
  63. इसे परथावां का इसा ही गीत : जैसा विवाह वैसे ही गीत।
  64. ई की मा तो ई नै ही जायो : इसके बारे मेँ अनुमान नहीँ लगाया जा सकता
  65. उघाड़ा मांस माथै तो माखी बैठैला ई : जो सुरक्षित नहीं है या जिसका कोई स्वामी नहीं है, उस चीज को सभी हड़पने की कोशिश करते हैं।
  66. उठै का मुरदा उठै बलेगा, अठे का अठे : एक स्थान की वस्तु दूसरे स्थान पर अनुपयोगी है
  67. उत्तर पातर, मैँ मियाँ तू चाकर : उऋण होने मेँ संतोष का द्योतक है
  68. उल्टो पाणी चीलां चढ़ै : अनहोनी की आशंका को व्यक्त करता है
  69. ऊँखली मै सिर दे जिको धमका सै के डरै : कठिन काम करने के लिए तैयार हो जाने पर विपत्तियोँ से कैसा डरना।
  70. ऊंट मिठाई इस्तरी, सोनो गहणो शाह पांच चीज पिरथी सिरै, वाह बीकाणा वाह : काव्य पंक्तियां मरुधरा की ऐसी पांच विशिष्टताओं को उल्लेखित करती है जिनकी सराहना समूची दुनिया में हो रही है
  71. एक घर तो डाकण ही टालें : बुरे से बुरे व्यक्ति को भी कहीं-न-कहीं तो लिहाज रखना ही पड़ता है।
  72. एक हाथ मैँ घोड़ो एक मैँ गधो है : भलाई-बुराई का साथ-साथ रहना।
  73. ऐँ बाई नै घर घणा : योग्य व्यक्ति हर जगह आदर पाता है।
  74. ओ ही काल को पड़बो, ओ ही बाप को मरबो : कठिनाईयाँ एक साथ आती हैँ
  75. ओछा की प्रीत कटारी को मरबो : ओछा अर्थात् निकृष्ट का साथ तथा कटारी से मरना दोनोँ ही एक समान हैँ।
  76. ओस चाट्यां कसो पेट भरै : निरर्थक प्रयास फलदायी नहीं होता।
  77. ओसर चूकी डूमणी, गावै आल पाताल : लक्ष्य से भटका हुआ व्यक्ति सार्थक कार्य नहीं कर सकता।
  78. ओसर चूक्या मैं मौसर नहीं मिलै : अवसर चूक जाने पर दुबारा हाथ नहीं आता।
  79. ओसर चूक्यां नै मौसर नहीँ मिलै : चूक होने पर अवसर नहीँ मिलता
  80. और सब सांग आ ज्यायं, बोरै वालो सांग कोन्या आवै : निर्धन बोहरे (धनी) का स्वांग नहीँ भर सकता।
  81. कंगाल छैल गाँव नै भारी : गरीब शौकीन व्यक्ति गाँव पर भारी पड़ता है।
  82. कंद कादणौ : समूल नष्ट करना।
  83. कदे न घोड़ा ही सिया, कदे न खीँच्या तंग। कदे न रांड्या रण चढ्या, कदे न बाजी जंग॥ : कायर पुरुष कभी भी साहसपूर्ण कार्य नहीँ कर सकता।
  84. कनकड़ा दोन्यू दीन बिगाड़्यो : निकृष्ट साधु दोनोँ ही धर्महीन हो जाते हैँ।
  85. कबूतर नै कुवो ही दीखै : प्रत्येक व्यक्ति को स्वार्थपरक लक्ष्य ही दिखाई देता है।
  86. कमाऊ आवै डरतो, निखटू आवै लड़तो : कमाने वाला डरता हुआ तथा निकम्मा व्यक्ति लड़ता हुआ आता है।
  87. कमेड़ी बाज नै कोनी जीतै : कमजोर बलवान से नहीँ जीत सकता।
  88. कलह कलासै पैँडे को पाणी नासै : घर मेँ क्लेश होने पर परीँडे का पानी भी नष्ट हो जाता है।
  89. कांदा छोलणा, कांदै रा छूंतरा उतारणा : छोटी-छोटी बातों को प्रकट करना।
  90. कांदे वाला छिलका है, ऊंची दे जितणी ही बास आवै : बुराई को जितने पास से देखोगे उतनी ही अधिक बुराई दिखाई देगी।
  91. कांन माथै जूं नीं रेंगणी : तनिक भी ध्यान न देना।
  92. कांनां रौ काचौ होणौ : सुनी सुनाई बात या शिकायत का जल्दी विश्वास करने वाला होना।
  93. कागलां कै काछड़ा होता तो उड़ता कोन्या दीखता? : मनुष्य के गुण स्पष्ट दिखाई देते हैँ।
  94. कागा हंस न गधा जती : बुरे व्यक्ति कभी अच्छे नहीं बनते।
  95. काटर कै हेज घणोँ : दूध न देने वाली गाय बछड़े से प्रेम प्रदर्शित करती है।
  96. काणती भेड़ को न्यारो ही र्याड़ो/गवाड़ो : निकृष्ट व्यक्तियोँ को जब विशिष्ट लोगोँ मेँ स्थान नहीँ मिलता तो वे अपना संगठन अलग ही बना लेते हैँ।
  97. काम की माँ उरैसी, पूत की माँ परैसी : कर्मठ व्यक्ति सभी को अच्छा लगता है, अकर्मण्य किसी को अच्छा नहीँ लगता।
  98. कामेड़ी बाज नै कोनी जीते : कमजोर ताकतवर को नहीं जीत सकता।
  99. काल मरी सासू आज आयो आँसू : शोक का दिखावा करना।
  100. काला कनै बैठ्यां काला लागै : दुर्जन के संग से कलंक लगता ही है।
  101. काळौ पीळौ होनौ : क्रोधित होना।
  102. किलौ जीतणौ : कठिन कार्य पर विजय पाना।
  103. कीड़ी संचै तीतर खाय, पापी को धन परलै जाय : पाप की कमाई कभी नहीं फलती।
  104. कुंदन जड़े न जड़ाव, जमे सलामत कीट। कहे जडिया सुण ले जगत, उड़े मेह की रीठ॥ : यदि नगीने जड़ते समय कुंदा न लगे तथा सलाइयोँ पर कीट जमने लगे तो वर्षा की सम्भावना होगी।
  105. कुए मैँ पड़कर सूको कोई भी निकलै ना : जैसा कार्य वैसा फल।
  106. कूंटौ काढ़णौ : अटका हुआ कार्य करना।
  107. कूवै भांग पड़णी : सबकी बुद्धि मारी जाना।
  108. खटाई में नांखणौ : दुविधा में छोड़ देना।
  109. खर, घूघू, मूरख नरा सदा सुखी प्रिथिराज : गधा, उल्लू तथा मूर्ख मनुष्य सदा सुखी रहते हैँ क्योँकि ये चिन्ता नहीँ करते।
  110. खाटा लारै खीचड़ौ ई आवै : जैसे को तैसा।
  111. खाटी छा नै राबड़ी सैं खोणौ : बिगड़े हुए काम को और भी बिगाड़ना।
  112. खाय धणी को, गीत गावै बीरे का : उचित व्यक्ति को श्रेय नहीं देना।
  113. खावै तो डाकण, ना खावै तो डाकण : बद से बदनाम बुरा होता है।
  114. खावै पुणू:जीवै दुणू : कम खाने वाला अधिक जीता है : खिजूर खाय सौ झाड़ पर चढ़ै : खतरा वही उठाता है जिसे लाभ की आशा होती है।
  115. खावै सूर कुटीजै पाडा : अपराध कोई करता है, दण्ड और किसी को मिलता है।
  116. खेती धणिया/कसम सेती : मालिक की देखरेख से ही खेती (कार्य) अच्छी होती/ता है।
  117. खैरात बंटै जठै मंगता आपे ही पूंच ज्यावै : जहाँ खैरात बँट रही हो, भिखारी पहुँच ही जाते हैँ।
  118. खोट वापरणौ : मन में छल-कपट उत्पन्न होना।
  119. खोयो ऊँट घड़ा मैँ ढूँढै : अत्यधिक ठगे जाने पर असम्भव भी सम्भव लगता है।
  120. गंगा तूतिये मैँ कोनी नावड़ै : गंगा नदी छोटे पात्र मेँ नहीँ आ सकती।
  121. गई बहू गयो काम, आई बहू आयो काम : किसी के भरोसे काम नहीँ रुक सकता।
  122. गणगौर्याँ नै ही घोड़ा नै दौड़े तो कद दौड़े : मौके को चूकना।
  123. गधा नै कांई ठा गंगाजळ कांई व्है : मूर्ख व्यक्ति अच्छी चीज की कीमत पहचान नहीं पाता है।
  124. गरदन माथै जुऔ धरणौ : जिम्मेदारी लेना।
  125. गळै टूंपौ आवणौ : संकट में पड़ना।
  126. गाँव तो बळै अर डूम नै तिंवारी भावै : विपत्ति में भी लाभ नहीं छोड़ना।
  127. गाँव तो बसियौ ई नीं अर मंगता आयग्या : कोई कार्य करने से पहले लाभ की सोचना।
  128. गांठ राखणी : मन में डाह रखना।
  129. गाडा नै देखकै पाडा का पग सूजगा : संकट के समय डर जाना।
  130. गाल बजाणा : बढ़-चढ़कर बातें मारना।
  131. गिरगिट रंग-बिरंग हो, मक्खी चटके देह। मकड़ियां चह-चह करे, जब अठ जोर मेह॥ : गिरगिट बार-बार रंग बदलता हो, मक्खी शरीर पर चिपके तथा मकड़ी आवाज करे तो वर्षा होने का अनुमान लगाया जाता है।
  132. गुण गैल पूजा : गुणवान की प्रतिष्ठा।
  133. गुण गैल पूजा : गुणों के अनुसार प्रतिष्ठा होती है।
  134. गुळ दियां मरै तौ जहर क्यूं दैणो : आसानी से काम निकलता हो तो सख्ती नहीं करनी चाहिए।
  135. गुळ-खाणौ नै गुलगुलां सूं परहेज करणौ : बड़ी बुराई करना और छोटी बुराई से बचना।
  136. गुड़ देता मरै बिनै झैर क्यूं देणूं : यदि मीठे वचन से काम निकलता हो तो कठोर वचन क्योँ बोला जाये।
  137. गेरदी लोई तो के करैगो कोई : निर्लज्ज होने पर कोई कुछ नहीँ कर सकता।
  138. गैली रांड का गैला पूत : पागल स्त्री की पागल सन्तान।
  139. गैली सारां पैली : अकर्मण्य हर जगह टांग अड़ाता है।
  140. गोद लडायो गीगलो, चढ्यो कचेड्या जाट। पीर लड़ आई पदमणी, तीन्यू ही बारा बाट॥ : अधिक प्यार मेँ पला हुआ लड़का, कचहरियोँ मेँ मुकदमेबाजी मेँ उलझा रहने वाला जाट तथा लड़कर पीहर गई स्त्री, ये तीनोँ बर्बाद हो जाते हैँ।
  141. गोलो र मूंज पराये बल आंवसै : जिस प्रकार मूँज पानी का बल पाकर ऐँठती है उसी प्रकार दास अपने स्वामी के बल पर अकड़ता है।
  142. घट्‌टी पीसणी : कड़ा परिश्रम करना।
  143. घण जाया घण ओलमा, घण जाये घण हाण : अधिक सन्तान होने से अधिक उपालम्भ मिलते हैँ तथा गालियां भी सुननी पड़ती हैँ।
  144. घण जायां घण नास : अधिक सन्तान कुटुम्ब की एकता का नाश कर देती हैँ।
  145. घण मीठा मैँ कीड़ा पड़ै : अत्यधिक प्रेम से खरास पड़ती है।
  146. घणी सूधी छिपकली चुग-चुग जिनावर खाय : अधिक सीधा या चतुर व्यक्ति कभी:कभी अधिक खतरनाक होता है।
  147. घणूं बल करया घूंडो पड़ै : खीँचातान से वैमनस्य बढ़ता है।
  148. घर आयां नै छोड़ नै बांबी पूजण जाय : घर वाले या नजदीकी योग्य व्यक्ति की कम पूछ होती है, बाहर वाले की अधिक।
  149. घर तो नागर बेल पड़ी, पड़ौसन को खोसै फूस : व्यक्ति के पास सब कुछ होते हुए भी वह दूसरे के माल पर नजर रखता है।
  150. घर फूट्या रावण मरै : घर में फूट होने से शक्तिशाली व्यक्ति को भी परास्त होना पड़ता है।
  151. घर में ऊंदरा इग्यारस करै : घर में नितांत भूखमरी होना।
  152. घर मैँ कोन्या तेल न ताई, रांड मरै गुलगुला तांई : घर मेँ तेल भी नहीँ है तथा रांड गुलगुले खाने के लिए लालायित है।
  153. घर-घर माटी का चूल्हा : सभी की एक सी स्थिति।
  154. घाट-घाट रौ पांणी पीणौ : बहुत अनुभव हासिल करना।
  155. घिस-घिस नै गोळ होणौ : किसी काम को करते रहने से उसमें निपुण होना।
  156. घूँट पीणौ : बरदाश्त करना।
  157. घूंघटा सै सती नहीँ, मुंडाया जती नहीँ : स्त्री घूंघट निकालने से सती नहीँ होती तथा पुरुष सिर मुंडा लेने मात्र से संन्यासी नहीँ हो जाता।
  158. घोड़ा बेच’र सोवणौ : बिल्कुल निश्चित होकर सोना।
  159. घोड़ी तो ठाण बिकै : गुणी की उपयुक्त जगह पर ही कीमत होती है।
  160. चंदण उतारणौ : बेवकूफ बनाकर माल हड़पना।
  161. चंदण लगाणौ : खर्चा करवाना।
  162. चळू भर पांणी में डूबणौ : लज्जा के मारे मर जाना।
  163. चाँद माथै थूकणौ : निर्दोष पर कलंक लगाना।
  164. चांदी देख्या चेतना, मुख देख्या त्यौहार : चाँदी के सामने होने पर चेतना तथा व्यक्ति के आमने:सामने होने पर व्यवहार किया जाता है।
  165. चाए जिता पालो, पाँख उगता ईँ उड़ ज्यासी : पक्षी के बच्चे को कितने ही लाड़:प्यार से रखो, वह पंख लगते ही उड़ जाता है।
  166. चाकरी सै सूं आकरी : नौकरी सबसे कठिन है।
  167. चादर देख नै पग पसारणा : अपनी सामर्थ्य के अनुसार काम करना।
  168. चाबी भरणी : किसी के विरुद्ध भड़काना।
  169. चालणी मैँ दूध दुवै, करमां नै दोस देवै : खुद मेँ अच्छे लक्षण नहीँ होने पर व्यर्थ ही भाग्य को कोसना।
  170. चावलां को खाणो, फलसै ताईँ जाणो : चावल खाने वाले मेँ शक्ति नहीँ होती, वह केवल दरवाजे तक जा सकता है।
  171. चिड़ी फंसाणी : अपने स्वार्थ के लिए किसी को चिकनी-चुपड़ी बातों से वश में करना।
  172. चिलम भरणी : खुशामद करना, जी हजूरी करना।
  173. चिड़ा-चिड़ी की के लड़ाई, चाल चिड़ा मैँ आई : चिड़िया व चिड़े की कैसी लड़ाई अर्थात् पति-पत्नी के बीच का मनमुटाव क्षणिक होता है।
  174. चिड़ी जो न्हावै धूल मैँ, हा आवण हार। जल मैँ न्हावै चिड़कली, मेह विदातिण बार॥ : चिड़िया के धूल मेँ नहाने पर वर्षा की सम्भावना होती है तथा पानी मेँ नहाने पर वर्षा काल समाप्ति की सम्भावना होती है।
  175. चीकणा घड़ा माथै पांणी नीं ठहरणौ : मूर्ख पर किसी प्रकार का असर न पड़ना।
  176. चीकणी चोटी का सै लगवाल : धनवान से कुछ प्राप्त करने की सभी की इच्छा होती है।
  177. चीकणै घड़े पर बूँद न लागै, जे लागै तो चीठौ : चिकने घड़े पर पानी नहीँ ठहरता पर मैल जम जाता है।
  178. चून को लोभी बातां सूं कद मानै : आटे का लोभी बातोँ से कैसे मान सकता है।
  179. चूलै में ऊंदरा दौड़णा : खाने को बिल्कुल न मिलना।
  180. चोखो करगो, नाम धरगो : अच्छा करने वाले की ख्याति रहती है।
  181. चोटी रौ पसीनौ अेडी तांई आणौ : कठिन परिश्रम करना।
  182. चौकी फेरणौ : घर की सब सम्पत्ति को बर्बाद कर देना।
  183. च्यार दिनां री चानणी, फेर अँधेरी रात : सुख का समय कम रहता है।
  184. छठी रौ दूध याद आणौ : भारी संकट पड़ना।
  185. छाज तो बोलै से बोलै पण चालणी भी बोलै जिकै ठोतरसो बेज : निर्दोष दूसरोँ को सीख देने का अधिकार रखता है पर दोषी किसी को क्या सीख देगा?
  186. छाती पर सवार होणौ : तंग करने के लिए सदैव सामने रहना।
  187. छाती बैठणी : अधिक खर्च होने की आशंका से घबराहट हो जाना।
  188. छाती माथै झेलणौ : आपत्ति को अपने ऊपर लेना।
  189. छींकौ टूटणौ : अनायास कोई लाभ होना।
  190. छींटा नांकणा : चुभती बात कहना।
  191. छोटी:छोटी कामणी सगळी विष की बेल : कामिनियाँ जहर की बेल के समान हैँ।
  192. छोटै मूंडै मोटी बात : अपनी हैसियत से अधिक बात करना।
  193. जंवाई रौ घोड़ौ अर सासू सरणाटा करै : किसी पराए के धन-वैभव पर अन्य द्वारा गर्व किया जाना।
  194. जखम ताजौ होणौ : भूली हुई विपत्ति या बात फिर से याद आ जाना।
  195. जणी गेलै नीं जाणौ वणी नै क्यूं पूछणौ : जिस कार्य को नहीं करना है, उससे सरोकार रखने से क्या प्रयोजन।
  196. जणी रूंखड़ा री छाया बैठै वणी री जड़ खोदै : जिसका आश्रय ले रखा है, उसका ही अहित करना।
  197. जतनां दही जमणौ : बुद्धिमानी से ही कार्य अच्छा होता है।
  198. जबान मैँ रस, जबान मैँ विष : बोली मेँ ही रस होता है तथा बोली मेँ ही जहर भी घुला रहता है अर्थात् बोली ही महत्त्वपूर्ण है।
  199. जमीन आसमान अेक करणौ : किसी कार्य के लिए अत्यधिक परिश्रम करना।
  200. जल को डूब्यो तिर कै निकलै, तिरिया डूब्यो बह जाय : पानी मेँ डूबा हुआ तैर कर बाहर आ सकता है परन्तु पर स्त्री आसक्त अवश्य डूबता है।
  201. जावो कलकत्तै सूं आगै, करम छाँवली सागै : भाग्य व्यक्ति के साथ रहता है।
  202. जीँ की खाई बाजरी, ऊं की भरी हाजरी : व्यक्ति जिसका दिया खाता है उसी की खुशामद भी करनी पड़ती है।
  203. जीभ रै ताळौ लागणौ : बोलती बंद होना।
  204. जीवडल्यां घर उजड़ै, जीवडल्यां घर होय : बुरी वाणी से घर उजड़ जाते हैँ तथा अच्छी वाणी से घर बस जाते हैँ।
  205. जीवती माखी कोन्या गिटी जावै : जानते हुए बुरा काम नहीँ किया जा सकता।
  206. जीवती माखी गिटणी : जानबूझकर अनुचित कार्य करना।
  207. जुग देख र जीणूं है : समय के अनुसार कार्य करना चाहिए।
  208. जुग फाट्याँ स्यार मरै : संगठन टूटने से हानि है।
  209. जेठ बदी दशमी, जे शनिवार होय। कण ई होय न धरण मैँ, बिरला जीवै कोय॥ : जेठ कृष्णा दशमी शनिवार को पड़ने पर वर्षा नहीँ होती।
  210. जेठा बेटा अर जेठा बाजरा राम दे तो पावै : ज्येष्ठ पुत्र तथा ज्येष्ठ माह मेँ बढ़ा हुआ बाजर भाग्य से ही प्राप्त होते हैँ।
  211. जेर सैँ ई सेर हुया करै है : बच्चोँ की उपेक्षा न करेँ क्योँकि वे भविष्य मेँ बलवान हो जाते हैँ।
  212. झाडू फेरणौ : बिल्कुल नष्ट कर देना।
  213. झूठ की डागलां ताईँ दौड़ : झूठ अधिक दिन नहीँ चलती।
  214. टकै की हांडी फूटी, गंडक की जात पिछाणी : थोड़े से नुकसान से नीच की पहचान होना।
  215. टाँग ऊपर राखणी : अपने विचारों को प्राथमिकता देना।
  216. टांटिया रै छत्तै में हाथ घालणौ : कष्टप्रद स्थिति पैदा कर लेना, कठिन कार्य हाथ में लेना।
  217. टूटी की बूटी कोनी : वृद्धावस्था मेँ जब आयु शेष नहीँ रहती तो दवा भी काम नहीँ करती है।
  218. टेक राखणी : बात को निभा लेना, इज्जत रख लेना।
  219. टेडी आँख सूं देखणौ : शत्रुता की दृष्टि से देखना
  220. टोपी उतारणी : 1. बेइज्जत करना, 2. कंगाल करना।
  221. टोलै मिलकी कांवली, आय थला बैठत। दिन चौथे के पाँचवैँ, जल थल एक करंत॥ : जब बड़ी संख्या मेँ चीलेँ एक स्थान पर इकट्ठी हो जायेँ तो वर्षा की सम्भावना होती है।
  222. ठंडो लौह तातै नै काटै : धैर्यशील व्यक्ति, दूसरे के गुस्से को शांत कर देता है।
  223. ठंडौ छांटौ नांखणौ : कोई आश्वासन देना।
  224. ठाडै कै धन को बोजो:बोजो रुखाळो है : शक्तिशाली का धन कोई नहीँ रख सकता।
  225. ठार-ठार नै खाणौ : हर कार्य में धैर्य रखना नितांत आवश्यक है।
  226. ठोकर खार हुंस्यार होय : मनुष्य को ठोकर लगकर ही अक्ल आती है।
  227. ठोकरा खातौ फिरणौ : इधर-उधर मारा-मारा फिरना।
  228. डर तो घणै खाय को है : डर तो अधिक खाने का है।
  229. डांगर के हेज घणूं, नापैरी के तेज घणूं : दूध न देने वाली गाय बछड़े से अधिक प्रेम करती है, पीहर न होने पर स्त्री अधिक झल्लाती है।
  230. डाकण नै किसौ माळवौ दूर है : समर्थ और प्रबल के लिए कोई कार्य मुश्किल नहीं होता है।
  231. डूंगरा नै छाया कोनी होय : महापुरुष अपनी मदद स्वयं करते हैँ, यह जनसाधारण के बस की बात नहीँ है।
  232. डूबती नाव पार लगाणी : दुख या विपत्ति से बचाना।
  233. डूबतै नै था’ मिळणी : संकट में सहारा मिलना।
  234. डोकरी रै कहवण सूं खीर कुण रांधै : साधारण व्यक्ति के सुझावों पर ध्यान नहीं दिया जाता है।
  235. डौड चावळ री खीचड़ी पकाणी : अपने विचारों को सबसे अलग रखना।
  236. ढक्या ढकण न उघाड़णौ : रहस्य प्रकट करना।
  237. ढांढा मारण, खेत सुकावण, तू क्यूं चाली आधै सावण : आधे सावन के बीत जाने पर मनोरम हवा पशुओँ तथा कृषि के लिए हानिप्रद होती है।
  238. ढाई दिन री बादसाहत करणी : थोड़े समय के लिए खूब ऐश्वर्य पाना।
  239. ढोल दमामा दुडबड़ी, बैठे सादर बाज। कहे डोम दिन तीन मेँ, इन्द्र करे आवाज॥ : यदि चमड़े से मढ़े ढोल नगाड़े आवाज न करेँ तो शीघ्र वर्षा आने की सम्भावना होती है।
  240. ढोल में पोल : अधिक बोलने वाले आदमियों की बातें पक्की नहीं हुआ करती हैं।
  241. तंगी मैँ कुण संगी : कमी मेँ किसी का सहार नहीँ मिलता।
  242. तळवा चाटणा : खूब खुशामद करना।
  243. तवै की काची नै, सासरै की भाजी नै कठैई ठौड कोनी : कच्ची रोटी तथा ससुराल को छोड़कर जाने वाली स्त्री का कोई ठौर:ठिकाना नहीँ रहता है।
  244. ताखड़ी आगै साच है / ताखड़ी धरम जांणै नै जात : तराजू में तुलने पर सत्य सामने आ जाएगा अर्थात् जाँच करने पर सत्य का पता चल जाएगा।
  245. ताता पाणी सै कसी बाड़ बळै : मात्र क्रोध मेँ किसी को कुछ कहने से उसका कुछ भी नहीँ बिगड़ता है।
  246. तारा तग-तग करैँ, अम्बर नीला हुन्त। पड़ै पटल पाणी तणी, जद संज्या फुलन्त॥ : नीले आसमान मेँ तारे टिमटिमाएं तथा सांझ फूले तो वर्षा आने की प्रबल सम्भावना हो जाती है।
  247. ताली लाग्यां तालो खुलै : युक्ति से ही कार्य होता है।
  248. ताळी मिळाणी : सांठ-गांठ करना।
  249. ताळी लाग्यां ताळो खुलै : युक्ति से ही काम होता है।
  250. तिणौ मेलियां आग उठै : थोड़ी-सी ही बात पर क्रोधित होना।
  251. तिल देखो तिलां री धार देखो : वक्त की नजाकत को देखकर कार्य करो। कुछ अनुभव हासिल करो।
  252. तिलक उधड़णौ : किसी के कपट का धीरे-धीरे पता चलना।
  253. तीज तिंवारा बावड़ी ले डूबी गणगौर : श्रावक शुक्ला तृतीया से त्योहार प्रारंभ होते हैं और चैत्र शुक्ला तृतीया गणगौर के साथ समापन हो जाता है।
  254. तीतर पंखी बादली, विधवा काली रेख। या बरसै या वध करै, इसमेँ मीन न मेख॥ : तीतर जैसी आकृति के छोटे:छोटे बादल छाने पर निश्चित रूप से वर्षा होती है।
  255. तूं डाल-डाल म्हैं पात-पात : विरोधी से ज्यादा सक्षम होना।
  256. तेल काढणौ, तेल पाड़णौ : परेशान करना।
  257. तेल तिला री धार देखणी : सोच-समझ कर कार्य करना।
  258. तेल तो तिलां सै ही निकलसी : तेल तिलोँ से ही निकलता है।
  259. थारा कांटा तनै ई भागैला : तुम्हारे बोए हुए काँटे तुम्हें ही चुभेंगे। अर्थात् बुरा करने पर स्वयं का भी बुरा ही होता है।
  260. थावर कीजे थरपना बुध कीजे बोपार : शनिवार की स्थापना और बुधवार को व्यापार करना शुभ माना जाता है।
  261. थावर कीजे थरपना बुध कीजै व्योहार : शनिवार को स्थापना तथा व्यवहार बुधवार को शुरु किया जाना अच्छा होता है।
  262. थोथा चिणा बाजै घणा : जिनमें गुण नहीं होते वे ही बढ़-चढ़कर बातें करते हैं।
  263. थोथो चणो बाजै घणो : अवगुणी अधिक बढ़:चढ़कर बातेँ करते हैँ।
  264. थोथो शंख पराई फूँक सै बाजै : जिस व्यक्ति मेँ स्वयं मेँ कोई गुण नहीँ होता वह दूसरोँ की सलाह से ही कार्य करता है।
  265. दमड़ी री डोकरी नै टकौ सिर मुंडाई रौ : कम मूल्य की वस्तु पर अधिक व्यय।
  266. दलाल कै दिवालो नहीँ, महजित कै तालो नहीँ : दलाल को घाटा नहीँ है, मस्जिद मेँ कोई समान न होने पर ताला लगाने की आवश्यकता नहीँ।
  267. दांत खाटा करणा : परास्त करना।
  268. दांतां लोही लागणौ : चश्का लग जाना, आदी हो जाना।
  269. दाई सूं पेट छिपाणौ : जानकार से कोई बात गुप्त नहीं रखी जा सकती है।
  270. दान री बाछी रा दांत कोनी गिणीजै : दान की बछिया के दाँत नहीं गिने जाते। मुफ्त की वस्तु गुण-दोष नहीं देखे जाते।
  271. दिन घरै आणा (होणा) : अनुकूल समय आना।
  272. दिन में तारा दिखाणा : बहुत कष्ट देना।
  273. दुनियां परायै सुख दूबळी : दुनियां दूसरों के सुख को देखकर ईर्ष्या करती है।
  274. दूखै ज़कै रै पीड़ हुवै : जिसके पीड़ा होगी उसी के दर्द होगा।
  275. दूज रौ चाँद : दर्शन दुर्लभ होना।
  276. दूध रो दूध, पांणी रो पांणी : दूध का दूध, पानी का पानी। सही-सही न्याय करना।
  277. दूध लजाणौ : अपने वंश की प्रतिष्ठा खत्म करना।
  278. दूबला नै दो असाढ़ : आपत्ति पर आपत्ति आना।
  279. दूर रा ढोल सुहावणा लागै : दूर के ढोल सुहावने लगते हैं। कोई चीज दूसरे के पास ही अच्छी लगती है।
  280. दूसरां को माल तूंतड़ा की धड़ मैँ जाय : दूसरोँ का धन लापरवाही से खर्च करना।
  281. देख खुरड़ कहे ढेढ की, कथा टूटे नेह। लेई चढ़ै न चामड़ै, मुकता बरसै मेह॥ : जूता बनाते समय चमड़े पर लेई का चढ़ना वर्षा आने का सूचक होता है।
  282. देखते नैणां चालते गोडां : देखने व चलने की शक्ति रहते हुए ही मृत्यु हो जाये तो अच्छा।
  283. देस जिस्यो भेस : जैसा देश वैसा वेश। स्थान व समयानुसार परिवर्तन कर लेना।
  284. देसी गधी पूरबी चाल : आडंबर करना।
  285. दोनूं हाथ मिलायां ही धुपै : दोनों ओर से कुछ झुकने पर ही समझौता होता है।
  286. दोनूं हाथांऊँ ताळी बाजै : दोनों हाथों से ताली बजती है। अर्थात् लड़ाई/समझौता दोनों पक्षों द्वारा प्रयास करने पर ही होता है।
  287. दोन्यू हाथ मिलायां ई धुपै : दोनोँ पक्षोँ के मिलने पर ही बात बनती है।
  288. धरम को धरम, करम को करम : स्वार्थ व परमार्थ दोनोँ का साथ:साथ पूरा होना।
  289. धरम री गाय रा दांत कांई देखणा : दान में अथवा मुफ्त मिली हुई वस्तु के गुण-अवगुण नहीं देखना चाहिए।
  290. धायो मीर, भूखो फकीर, मरयां पाछै पीर : मुसलमान तृप्त हो तो अमीर, भूखा हो तो फकीर तथा मरने के बाद पीर कहलाता है।
  291. धीणोड़ी सागै हीणोड़ी मर ज्याय : दुधारी गाय के होने पर बिना दूध वाली गाय को कोई नहीँ पूछता।
  292. धूप में बाळ पकाणा : बिना अनुभव प्राप्त किए आयु बिता देना।
  293. धोबी की हांते, गधो खाय : नीच का धन नीच खाता है।
  294. धोरां किण रा अहसांन राखै : योग्य तथा बड़े आदमी किसी का अहसान नहीं रखते हैं।
  295. धौळै दिन दीवाळी करणी : अनहोनी बात करनी।
  296. धौळौ दिन करणौ : महत्त्वपूर्ण कार्य करना।
  297. न कोई की राई में, न कोई दुहाई में : वह अपने काम से काम रखता है।
  298. न कोई की राई मैँ, न दुहाई मैँ : अपने काम से काम रखना।
  299. नंदी कनलौ जांट, कद होण बिनास : नदी किनारे लगा वृक्ष कभी भी नष्ट हो सकता है।
  300. नकटा देव सूंमड़ा पूजारी : जैसा को तैसा।
  301. नकटी देवी, ऊत पुजारी : जैसा राजा वैसी जनता।
  302. नगारा मैँ तूती की आवाज कुण/कोन्या सुणै : बड़े लोगोँ मेँ छोटोँ की उपेक्षा।
  303. नगारा रौ ऊँट : निर्लज्ज, ढीठ।
  304. नर नानेरै, घोड़ो दादेरै : स्वभाव तथा बनावट मेँ पुरुष ननिहाल पर जाता है जबकि घोड़ा पितृकुल पर।
  305. ना सावण सुरंगो, ना भादवो हरयो : ना सावन रंगीन न भादो हरा। सदा एक समान होना।
  306. नांव जिसाई गुण : जैसा नाम वैसे गुण।
  307. नांव राखै गीतड़ा कै भीँतड़ा : काव्य निर्माण से या घर निर्माण से व्यक्ति का यश चिरस्थाई रहता है।
  308. नाक रै चूनौ लगाणौ : किसी की इज्जत के बट्‌टा लगाना।
  309. नाजुरतिये की लुगाई, जगत की भोजाई : कमजोर व्यक्ति की वस्तु पर सबका अधिकार।
  310. नानी कसम करै, दोयती नै डंड : नानी के दूसरा पति कर लेने पर उसकी दोहिती तक को सामाजिक दंड मिलता है।
  311. नारनौल की आग पटीकड़ै दाजै : बुरे कर्म कोई करता है, फल किसी को मिलता है।
  312. निकली होठां, चढ़ी होठां : होठोँ से बाहर आते ही बात का फैलना।
  313. नींद बैच ओजकौ मोल लैणौ : बेमतलब समस्या मोल लेना।
  314. नीत गैल बरकत है : जैसी नियत होती है वैसा ही प्राप्त होता है।
  315. नेकी कर कूवै में न्हांक : नेकी कर दरिया में डाल। अच्छा काम करके भूल जाना।
  316. नेम निभाणा, धर्म ठिकाणा : नियम:धर्म संयमी के पास ही रहते हैँ।
  317. नैणां में जेठ असाढ़ लागणौ : आंसुओं की झड़ी लग जाना।
  318. नौ – नौ ताळ कूदणौ : थोड़ी-सी खुशी या लाभ का अत्यधिक प्रदर्शन करना।
  319. न्यारा घरां का न्यारा बारणां : सब घरोँ की अलग:अलग रीति।
  320. पईसा धूळ में राळणा : धन की व्यर्थ बरबादी करना।
  321. पग तोड़णा : बहुत परिश्रम करना।
  322. पग फूँक-फूँक’र दैणौ : 1. बहुत विचार कर कार्य करना, 2. बहुत सतर्कतापूर्वक चलना।
  323. पगड़ी उछाळणी : बेइज्जती करना।
  324. पगां नै कुल्हाड़ी बांणौ : अपने हाथ अपना नुकसान करना।
  325. पड़ पड़ कै ई सवार होय है : गलती करते – करते ही मनुष्य होशियार हो जाता है।
  326. पपैया पीऊ:पीऊ करेँ, मोरा घणी अजग्म। छत्र करै मोरिया सिरे, नदिया बहे अथग्म॥ : मोर के नाचने पर तथा पपीहे के पीहू:पीहू करने पर भारी वर्षा सम्भावित रहती है।
  327. पर नारी पैनी छुरी, तीन ओड सै खाय। धन छीजे, जोबन हडै, पत पंचा मैँ जाय॥ : पर स्त्री ऐसी तेज छुरी के समान होती है जो तीन प्रकार की हानि करती है— इससे धन क्षीण होता है, यौवन का नाश हो जाता है तथा लोक मेँ बदनामी होती है।
  328. पलक बिछाणी : अत्यंत प्रेम से स्वागत करना।
  329. पवन गिरि छूटे पुरवाई। धर गिर छोबा, इन्द्र धपाई॥ : पूरब से हवा चलने पर वर्षा धरती व पर्वत तक को तृप्त करेगी।
  330. पसीना रौ खून करणौ : अथक परिश्रम करना।
  331. पहाड़ टूटणौ, पहाड़ टूट पड़णौ : एकाएक भारी आफत आ जाना।
  332. पहेली बुझाणौ : घुमा-फिरा कर कहना।
  333. पाँच आंगलियां पूंच्यौँ भारी : एकता मेँ शक्ति है।
  334. पाँव उभाणा जायसी, कोडीयज कंगाल : मरते समय सब नंगे ही जायेँगे।
  335. पांचू आंगली एक:सी कोनी होवैँ : सब एक समान नहीँ होते।
  336. पांचू आंगळी घी में होणी : चारों ओर से लाभ होना। सुख से दिन कटना।
  337. पांणी उतरणौ : अपमानित होना या लज्जित होना।
  338. पांणी ऊपरा कर फिरणौ : काबू से बाहर हो जाना।
  339. पांणी पिछांणणौ : वास्तविकता समझना।
  340. पांणी पी’र जात पूछणी : स्वार्थ सिद्धि के बाद औचित्य पर ध्यान देना।
  341. पाटी में आणौ : किसी के सिखाने में आना।
  342. पाप को घड़ो भर कै फूटै : अत्यधिक पाप बढ़ जाने पर पापी का विनाश हो ही जाता है।
  343. पाप री पांण आये बिन कोनी रैवे : पाप अपना असर अवश्य दिखलाता है।
  344. पाप रो घड़ौ फूटणौ : किसी के अत्याचारों या कुकर्मों का भंडाफोड़ होना।
  345. पीरकां की आस करै जकी भाईड़ां नै रोवै : जिससे या जिस स्थान से कुछ न मिले वहाँ से कोई भी आशा रखना व्यर्थ है।
  346. पीळा चावळ दैणा (मेलणा) : किसी शुभ अवसर पर सम्मिलित होने के लिए निमंत्रण देना।
  347. पीसो गाँठ को, हथियार हाथ को : गाँठ यानि पास रखा धन तथा हाथ मेँ उठाया हथियार ही काम मेँ आता है।
  348. पुल का बाया मोती निपजै : अवसर पर किया गया कार्य ही फल देता है।
  349. पूत का पग पालणै ही दिख्यावै : बालक का भविष्य बचपन मेँ ही दिखाई देने लगता है।
  350. पैली पडवा गाजै, दिन बहत्तर बाजै : आषाढ़ की प्रतिपदा को बादल गरजने पर हवा तो चलेगी पर बरसात नहीँ होगी।
  351. पड़:पड़ कई सवार होय है : मनुष्य गलतियोँ से सीखता है।
  352. फन पड़े तो यूं कहे, सुण तरुवर बनराय। इबका बिछड्या कब मिलां, दूर पडांगा जाय॥ : पत्ता पेड़ से कहता है कि तरुवर अब मैँ टूट गया हूँ पता नहीँ फिर कब मिलूँगा।
  353. फाड़णियाँ नै सीमणियाँ कोनी नावड़ै : अत्यधिक व्यय करने पर कितनी भी कमाई हो, वह कम ही रहती है।
  354. फूटी आँख नीं सुहावणौ : अत्यन्त अप्रिय लगना।
  355. फूट्यो ढोल होणौ : नितांत मूर्ख होना।
  356. बंबी में बड़तां तौ साप ईं सीधौ व्है : समय आने पर धूर्त व कपटी को भी सरल व सीधा होना पड़ता है।
  357. बजनस पवन सुरिया बाजै। घड़ी पलक मांही मेह गाजै॥ : उत्तर:पश्चिम से हवा चलने पर शीघ्र वर्षा होगी।
  358. बा रै घाट रौ पांणी पीणौ : अनुभवी होना।
  359. बांदरै आळी पंचायती : दूसरों के झगड़े में अपना लाभ उठाना।
  360. बादल रहे रात को बासी, तो जाणो चोकस मेह आसी : पहले वाली रात के बादल सुबह तक छाये रहेँ तो वर्षा निश्चित रूप से होती है।
  361. बादळ देख घड़ौ फोड़णौ : झूठी बात पर काम करना।
  362. बालक देखै हीयो, बूढ़ो देखै किणै : बालक प्रेमभाव को पहचानता है जबकि वृद्ध केवल काम की बात को देखता है।
  363. बाळ ई बांकौ नीं होणौ : जरा भी हानि न होना।
  364. बावै सो लूणे : जो जैसा बोता है, वैसा काटता है।
  365. बाड़ कै सहारै दूब बधै : कमजोर व्यक्ति भी आश्रय पाकर बढ़ता है।
  366. बिगड़ी घिरत बिलोवणो, नारी होय उदास। असवारी मेँह की, रहे छास की छास॥ : दही बिलौने पर घी बिखर:बिखर जाये तो समझो जोर की वर्षा होगी।
  367. बिल्ली रै भाग रो छींको टूटग्यो : बिल्ली के भाग्य से छींका टूट गया। अयोग्य व्यक्ति को भी अचानक लाभ होना।
  368. बींटा बांधणा : रवाना होने की तैयारी करना, पलायन करना।
  369. बीड़ौ उठाणौ, बीड़ौ चाबणौ, बीड़ौ झेलणौ, बीड़ी लैणौ : किसी कार्य का उत्तरदायित्व लेना, कार्य के प्रति कटिबद्ध होना।
  370. बड़ा:बड़ा गाँव जाऊँ, बड़ा:बड़ा लाडू खाऊँ : स्वप्न मेँ ही धनी बनने की सोचना अथवा हवाई किले बनाना।
  371. बड़ै लोगां कै कान होय है, आँख नहीँ : बड़े लोग सुनी:सुनाई बात पर ही विश्वास कर लेते हैँ, स्वयं जाँच:परख नहीँ कराते।
  372. भरोसै री भैंस पाडो ल्याई : जिस कार्य में विशेष लाभ की आशा हो लेकिन वैसा लाभ न हो पाए।
  373. भाठै सूं भाठो भिड्याँ बिजली चमकै : दो दुष्टोँ की लड़ाई मेँ नाश हो जाता है।
  374. भूंड रो ठीकरौ कोई नीं लिया करै : बदनामी किसी को स्वीकार्य नहीं होती है।
  375. भूखां मरतां नै राब सीरै जिसी लागै : भूखे व्यक्ति को राबड़ी हलुवे जैसी लगती है।
  376. भैंस रै आगे बीण बजाई, गोबर रो इनाम : भैंस के आगे वीणा बजाई तो गोबर का इनाम मिलेगा। गुण ग्राहक ही गुणों की कद्र कर सकता है।
  377. मतलब की मनुहार, जगत जिमावै चूरमा : स्वार्थ हेतु दूसरोँ की खुशामद करना।
  378. मन कै पाज कोनी : मन चंचल है, उसकी मर्यादा नहीँ होती।
  379. मन रा लाडुवां सूं भूख नीं भाग्या करै : कल्पना के लड्डुवों से भूख शांत नहीं हो सकती।
  380. मां मरी आधी रात, बाप मर्यो परभात : बार:बार विपत्तियाँ आना।
  381. मांटी की भीँत डिगती बार कोनी लगावै : मिट्टी की दीवार गिरने मेँ समय नहीँ लगता।
  382. माया अंट की, विद्या कंठ की : जो पैसा अपने पास हो तथा जो ज्ञान कंठस्थ हो वही काम आता है।
  383. मारणूं ऊंदरो, खोदणूं डूंगर : छोटे कार्य के लिए बड़ा कष्ट उठाना।
  384. माल सैँ चाल आवै : धन आने पर अक्ल पैदा हो जाती है।
  385. मियां मरग्या कै रोजा घटग्या : अभी भी देर नहीं हुई है।
  386. मींडका नै तिरणूं कुण सिखावै : मेँढक को तैरना कौन सिखाता है अर्थात् यह तो उसका स्वाभाविक गुण है।
  387. मूंछ्या रा चावळ राखणा : अपनी प्रतिष्ठा बनाए रखना।
  388. मोर्‌यौ नाच कूद’र पगां सांमी देखै : व्यक्ति को अपनी गलतियों का अहसास अंत में होता है।
  389. म्यांऊँ रो मूंडौ पकड़णौ : खतरे का सामना करना।
  390. यारी को घर दूर है : दोस्ती निभाना कठिन है।
  391. रांडां रोती रै नै पामणा जीमता रै : दूसरों के कहने की कुछ भी परवाह नहीं करना।
  392. राख पत, रखाय पत : दूसरोँ का सम्मान करने पर वे भी सम्मान करते हैँ।
  393. रात च्यानणी, बात आँख्या देखी मानणी : चांदनी रात ही अच्छी होती है तथा आँखोँ देखी बात पर ही विश्वास करना चाहिए।
  394. रीस रै आंख्यां नी हुया करै : क्रोध में व्यक्ति विवेकहीन हो जाता है।
  395. रूप की रोवै, करम की खाय : रूपवती स्त्री भी दुःखी रहती है परन्तु कर्मशील कुरूप स्त्री भी भूखी नहीँ रहती।
  396. रोयां राबड़ी कुण घालै : परिश्रम से सब कुछ प्राप्त होता है, केवल रोने से कुछ नहीँ होता।
  397. लकीर रौ फकीर होणौ : रूढ़ियों का अंधानुकरण करना।
  398. लरड़ी माथै ऊन कुण राखै : गरीब का शोषण सब करते हैं।
  399. लाठी हाथ मैं तो सगळा साथ मै : लाठी हाथ में तो सभी साथ में होते हैं। शक्तिशाली का सभी साथ देते हैं।
  400. लेवण गई पूत गमा आई खसम : लाभ के बदले पूँजी भी गंवा देना।
  401. लोभ गळौ कटावै : अधिक लाभ की इच्छा रखने वाले को कभी-कभी नुकसान उठाना पड़ता है।
  402. लोहा, लकड़ा, चामड़ा, पहला किसा बखाण। बहु, बछेरा, डीकरा, नीमटियो पछाण॥ : लोहे का, लकड़ी तथा चमड़े का पहले से पता लगाना मुश्किल है। बहू, लड़का तथा घोड़े के बच्चोँ के गुणोँ का पता वयस्क होने पर ही चलता है।
  403. वात, पित युक्त देह ज्यांक, होय रहे धाम:धूम। अण भणियां आलम कथी कहे मेहा अतिघोर॥ : वातयुक्त व्यक्ति को यदि गर्मी से सिर दर्द करे तो वर्षा की सम्भावना होती है।
  404. शुक्रवार की बादली, रही शनिचर छाय। डंक कहे है, भडली बरस्यां बिना न जाय॥ : शुक्रवार को आकाश पर बने बादल यदि शनिवार तक रहेँ तो वर्षा अवश्य होती है।
  405. शेखावाटी कहावतें
  406. संवारता बार लागै, बिगाड़तां कोनी लागै : काम बनाने मेँ समय लगता है बिगाड़ने मेँ नहीँ।
  407. संवारै रो गाजियो ऐलौ नहीँ जाय : सुबह मेघ:गर्जन निश्चित रूप से वर्षा का संकेत है।
  408. सगलै गुण की बूज है : गुणी का हर जगह सम्मान होता है।
  409. सगळै ई चोखै कामां मै बिघन आया करै : अच्छे कार्यों में हर जगह विघ्न आया करते हैं।
  410. सदा न जुग जीवणा, सदा न काला केस : संसार मेँ हमेशा कोई नहीँ रहता, इसी प्रकार यौवन भी साथ छोड़ देता है।
  411. साँच कही थी मावडी, झूठ कह था लोग। खारी लागी मावडी, मीठा लाग्या लोग॥ : माता का सच भी झूठ नजर आया जबकि लोग ही झूठ बोल रहे थे, क्योँकि लोग मधुर बोल रहे थे तथा माता कटु बोल रही थी।
  412. सांप कै मांवसियां की के साख : दुष्ट का क्या भरोसा?
  413. सांप, गोयरा, डेडरा, कीड़ी:मकोड़ी जाण। दर छोड़ै बाहर भागे, नहीँ मेह की हाण॥ : यदि मेँढक, चीँटी, साँप आदि अपने:अपने स्थान पर जाने लगेँ तो भारी वर्षा की सम्भावना होती है।
  414. सांभर में लूण रौ टोटौ : किसी वस्तु के विशाल भंडार के स्थान पर भी उस वस्तु की कमी अनुभव करना।
  415. सावळ करतां कावळ पड़ै : भलाई करते हुए भी बुराई हाथ लगती है।
  416. सिर चढ़ाई गादड़ी गाँव ई फूंकै लागी : निकृष्ट को मुँह लगाने पर हानिकारक हो जाता है।
  417. सूरज कुंड और चन्द्र जलेरी। टूट्या टीबा भरगी डेरी॥ : चन्द्रमा के चारोँ ओर जलेरी तथा सूरज के चारोँ ओर कुण्ड होने पर भारी वर्षा की सम्भावना होती है।
  418. सोनै के काट कोन्या लागै : सज्जन के कलंक नहीं लगता।
  419. सोनै कै काट कोन्या लागै : सज्जन पुरुषोँ पर कलंक नहीँ लगाया जा सकता।
  420. सौ सोनार री अेक लुवार री : बलवान की एक ही चोट पर्याप्त होती है।
  421. सौ-सौ ऊंदरा खाय मिन्नी हज करबा चली : बड़े पाखंडी द्वारा भले बनने का बाह्याडंबर करना।
  422. हतकार की रोटी चौवटे ढकार : मुफ्त मेँ उपभोग करना तथा अहंकार का प्रदर्शन करना।
  423. हथेळी माथै जांन राखणी : जोखिम का काम करना, जान हाथ में रखना।
  424. हर बड़ा क हिरणा बड़ा, सगुणा बड़ा क श्याम। अरजन रथ नै हांक दे, भली करै भगवान॥ : यह माना जाता है कि हरिण जब बाँयी ओर आ जाये तो अपशकुन होता है। हरिणोँ के बाँयी ओर आने पर अर्जुन ने रथ रोक दिया परन्तु किसी ने कहा कि भगवान साथ होने पर कुछ भी अपशकुन नहीँ होता है।
  425. हवन करतां हाथ बळणा : भला करने पर भी बुराई मिलना
  426. हवा होणौ : अत्यंत तीव्र भागना, चंपत हो जाना।
  427. हांसी में खांसी हो ज्याय : हँसी-मजाक मेँ लड़ाई हो जाती है।
  428. हाकिमी गरमाई की, दुकनदारी नरमाई की : अफसर को कड़क तथा दुकानदार को विनम्र रहना चाहिए।
  429. होत की भाण, अणहोत को भाई : बहिन धनी को भाई बनाती है जबकि भाई विपत्ति मेँ भी साथ देता है।

Revision Complete!

अब देखते हैं कितना याद रहा — इस topic के MCQ solve करो।

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