कौनसा रिवाज विवाह से संबंधित नहीं है -
सही उत्तर: नांगल
RPSC & RSMSSB PYQ Practice
इस पेज पर Rajasthan GK के राजस्थान में रीति -रिवाज एवं प्रथाएं से संबंधित पिछले वर्षों में पूछे गए महत्वपूर्ण वस्तुनिष्ठ प्रश्न (MCQ) उत्तर और व्याख्या सहित दिए गए हैं। कुल 140 प्रश्नों में से यह पेज 13 है।
कौनसा रिवाज विवाह से संबंधित नहीं है -
सही उत्तर: नांगल
आदिवासीयों में कटकी वस्त्र पहना जाता है -
सही उत्तर: अविवाहित युवतियों द्वारा
राजस्थान में पैरों की अंगुलियों में पहना जाने वाला आभूषण है -`
सही उत्तर: बिछिया
विवाह से सम्बन्धित रस्म है -
सही उत्तर: ये सभी
राजस्थान में जलवा पूूजन किया जाता है -
सही उत्तर: बच्चे के जन्म के कुछ दिन पश्चात्
व्याख्या (Explanation)
कुआं पूजन पुत्र प्राप्ति पर किया जाता है। राजस्थान में इसे ‘जलवा पूजन’ भी कहते हैं। आधुनिक समय में इसे जन्मोत्सव के रूप में भी मनाया जाता है। इसके अन्तर्गत मुख्यरूप से जलदेवता अर्थात् वरुणदेव की पूजा की जाती है। नवजात शिशु की मां कुएं अथवा नदी पर जाती है और वहां उसका पूजन कर जल लेकर आती है।
राजस्थान में सागड़ी प्रथा क्या थी -
सही उत्तर: हाली प्रथा
हाली प्रथा से आशय है-
सही उत्तर: खेतों व घरों पर काम करने वाले बंधुआ मजदुर से
व्याख्या (Explanation)
हाली पद्धति बंधुआ मजदूर एवं बंधुआ मजदूरी से संबंधित थे/था। इस पद्धति में उच्च जातियों के यहाँ पुश्तैनी मजदूर के रूप में कार्य करना होता था।
राज्य में सर्वप्रथम सती प्रथा पर रोक किस जिले द्वारा लगाई गई-
सही उत्तर: बूँदी
व्याख्या (Explanation)
सती प्रथा को सर्वप्रथम रोकने का प्रयास मोहम्मद बिन तुगलक ने किया। अकबर ने भी इस प्रथा को रोकने का प्रयास किया था। राजस्थान में इस प्रथा को सर्वप्रथम बंद 1822 ई. में बूँदी रियासत के विष्णुसिंह ने किया।
शारदा एक्ट 1929 के द्वारा विवाह के लिए कन्या एंव युवक की न्यूनतम कितनी आयु तय की गई-
सही उत्तर: 14 व 18
व्याख्या (Explanation)
शारदा एक्ट : इसे बाल विवाह निरोध अधिनियम, 1929 नामक दूसरा नाम दिया गया। बाल विवाह निरोध अधिनियम 28 सितंबर 1929 को पारित एक विधायी अधिनियम था। इस अधिनियम में लड़कियों की विवाह योग्य आयु 14 वर्ष और लड़कों के लिए 18 वर्ष निर्धारित की गई थी।
1832 में कानून बनाकर दास प्रथा को समाप्त करनें वाला गवर्नर जनरल निम्न में सें कौन था-
सही उत्तर: लार्ड विलियम बैंटिक
व्याख्या (Explanation)
दास प्रथा का सर्वप्रथम उल्लेख कोटिल्य ने अपने ग्रंथ अर्थशास्त्र में किया है जिसमें नौ प्रकार के दासों का उल्लेख है। 1562 ई. में इस प्रथा पर रोक अकबर ने लगाई थी। दासों के निवास स्थान को राजलोक कहते थे। डावडी, पड़दायल, पासवान, खवासन दासियों के प्रकार थे। दासियों से उत्पन्न पुत्र दासी पुत्र या औरस पुत्र कहलाते थे। 1832 ई. में लार्ड विलयम बैंटिक ने दास निवारक अधिनियम बनाया। इस प्रथा को सर्वप्रथम बंद 1832 ई. में कोटा ने किया।